राग दरबारी: हँसी में छुपी सच्चाई l Raag Darbari by Shri Lal Shukla lPart 17l
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“जहाँ व्यवस्था गाती है… वहाँ बजता है राग दरबारी” “शिवपालगंज की गलियों से… व्यंग्य की गूँज – राग दरबारी”श्रीलाल शुक्ल द्वारा रचित “राग दरबारी” हिंदी साहित्य का एक अत्यंत चर्चित और व्यंग्यात्मक उपन्यास है। यह उपन्यास स्वतंत्रता के बाद के भारतीय ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं को तीखे व्यंग्य और गहरी सामाजिक समझ के साथ प्रस्तुत करता है। कहानी का केंद्र एक काल्पनिक गाँव “शिवपालगंज” है, जहाँ राजनीति, जातिवाद, शिक्षा, प्रशासन और नैतिक पतन का जीवंत चित्रण मिलता है।उपन्यास का मुख्य पात्र रंगनाथ है, जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद गाँव आता है और वहाँ की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को नज़दीक से देखता है। गाँव के प्रभावशाली लोग—जैसे वैद्यजी—सत्ता, चालाकी और स्वार्थ के प्रतीक बनकर उभरते हैं। लोकतंत्र, पंचायत व्यवस्था और शिक्षा जैसे आदर्श संस्थान यहाँ अपने मूल उद्देश्य से भटके हुए दिखाई देते हैं।राग दरबारी केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भारतीय समाज का आईना है। इसमें हास्य के साथ-साथ गहरी पीड़ा और सच्चाई छिपी है। लेखक ने सरल भाषा में जटिल सामाजिक समस्याओं को इस तरह प्रस्तुत किया है कि पाठक हँसते-हँसते सोचने पर मजबूर हो जाता है। यही कारण है कि यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रभावशाली है जितना अपने समय में था।